छह राज्यों से आई टीम बिखेरेगी होली के रंग, नर-मुंड लिये शामिल होंगे भूत-पिशाच

वाराणसी। बनारस की शिव बारात इस बार भी अनूठी और अद्भुत होगी। इस बार होलियाना मौज-मस्ती के साथ बाबा की शिव बारात निकाली जायेगी। इस बार शिव बारात में मदारी, सपेरे, भिखारी, भूत-पिशाच, योगिनी के साथ ही भंग की तरंग में झूमते हुए शिव भक्त रहेंगे। वहीं लाग-विमान के साथ ही छह राज्यों की होली की टीम भी दिखेगी। खास बात यह कि शिव बारात में सभी राज्यों से आये लोग अपने-अपने ढंग से होली का रंग बिखेरते हुए चलेंगे। शिव बारात समिति की ओर से निकाली जा रही शिव बारात का इस वर्ष 43वां वर्ष है। यह बारात पिछले 43 सालों से अनवरत निकाली जा रही है। यह सच है कि जिस दिन महाशिवरात्रि पर अड़पबंगी बाबा की शिव बारात निकाली जाती है उस दिन ऐसा आभास होता है कि भगवान शिव खुद इस बारात में शामिल हो गये हैं। नर-मुंड लिये हुए भूत-पिशाचों की नृत्य करती हुई टोली, बड़े वाहन पर स्थापित विशाल शिवलिंग, दर्जनों बैंड बाजा, जगह-जगह ठंडई व भांग का वितरण यह सब देख कर लगता है कि बाबा विश्वनाथ खुद इस बारात में चल रहे हैं। शिव बारात हमेशा की तरह वृद्धकाल (दारानगर) से प्रा्रंभ होकर मैदागिन, नीचीबाग, बुलानाला, चौक, काशी विश्वनाथ धाम, बांसफाटक, गोदौलिया होती हुई डेढ़सी पुल (दशाश्वमेधघाट) तक पहुंचती है। जहां पर पहल सले ही तैयार शिव भक्त ठंडई के साथ शिव बारात में शामिल भक्तों का स्वागत करते हैं। इसके साथ ही खूब अबीर गुलाल उड़ायी जाती है। पूरा माहौल होलियाना हो जाता है। शिव बारात समिति के संयोजक दिलीप सिंह बताते हैं कि शिव बारात समिति का मूल उद्देश्य काशी की पहचान व काशी की मौज मस्ती तथा बनारसीपन जिंदा रहे। इसके साथ ही गंगा जमुनी तहजीब बरकरार रहे। इसीलिए यह शिव बारात निकाली जाती है। वे बताते हैं कि काशी की जनता विभिन्न राज्यों में होली कैसे खेलते हैं, यह देखने को मिलेगा। वे बताते हैं कि भगवान शंकर व पार्वती का विवाह शिवरात्रि पर हुआ था। काशी के लोगों का संबंध भगवान एवं भक्त का नहीं है। बल्कि पिता एवं पुत्र का है। हम सभी काशीवासी भगवान शिव के पुत्र हैं। इसलिए उनकी शादी की वर्षगांठ को प्रतिवर्ष मनाते हैं। साथ ही उनको यादगार बनाने का प्रयास करते हैं। शिव बारात समिति के संयोजक दिलीप सिंह बताते हैं कि काशी का शिव बारात कोई विवाह यात्रा नहीं है। बल्कि बाबा की शादी की वर्षगांठ है। जो हर साल मनाया जाता है। इस देश में या तो जगन्नाथपुरी के रथयात्रा मेले में राजा हो या रंक सभी एक भाव से चलते हैं। अथवा लगभग उसी तरह काशी के शिव बारात में सभी श्रद्धालु शिव भक्त एक ही भाव में चलते हुए दिखायी पड़ते हैं। यहां पर किसी को ऊंचा पीढ़ा नहीं मिलता। यहां पर काशी की गंगा जमुनी तहजीब है, जिसमें हिंदू-मुस्लिम , सिख ईसाई सभी एक समान भाव में रहते हैं। दिलीप सिंह बताते हैं कि जिस समय शिवजी थे, उस समय कोई जाति धर्म नहीं था। सिर्फ दो वर्ग था। पहला सद्जात (अच्छे लोग) दूसरा बदजात (खराब लोग) थे। शिव बारात समिति जाति या धर्म को नहीं मानती है। काशी में शिव बारात समिति की ओर से वर्ष 1983 से शिव बारात निकाली जा रही है। बताते हौं कि जब काशी विश्वनाथ मंदिर में सोने की चोरी हुई थी। उसकी बरामदगी के बाद शिव बारात उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। जो कालांतर में शिव बारात का स्वरूप ले लिया। काशी की शिव बारात दुनिया की पहली शिव बारात है जिसे लोगों ने यह दर्जा प्रदान किया है। वैसे तो देश भर में लगभग 20 शिव बारात निकलती है लेकिन जो शिव बारात काशी से निकाली जाती है उसके मुकाबले कोई भी शिव बारात नहीं रहती है। शिव बारात में शिव भक्तों के साथ ही अलग-अलग बग्घी पर दूल्हा व दुल्हन भी रहते हैं। इनके साथ ही सहउल्ला भी रहते हैं। पहले दूल्हा वरिष्ठ साहित्यकार व रचनाकार पं. धर्मशील चतुर्वेदी बनते थे। जबकि सहउल्ला वरिष्ठ हास्य कवि सांड़ बनारसी बनते थे। अब दूल्हा हास्य कवि सांड़ बनारसी बनते हैं। जबकि सहउल्ला जगद्म्बा तुलस्यान व अमर नाथ शर्मा बनते हैं। दुल्हन के रूप में बदरूद्दीन अहमद बनते हैं।

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