स्वर-ताल की अनुगूंज से गुंजित हुआ मंदिर परिसर

वाराणसी (सन्मार्ग)। हनुमान जी का पवित्र दरबार संकट मोचन मंदिर, वार्षिक शास्त्रीय संगीत समारोह, विभिन्न घरानों के प्रतिष्ठित युवा कला साधक, मुक्ताकाशीय मंच, संगीत रसिकों की जमघट, एक संगीत महाकुंभ का रूप ले चुका है। इस महाकुंभ में कुछ गोता लगाकर तृप्त हो जाते हैं और कुछ इसका हिस्सा बनकर ही अपने आपको धन्य बना लेते हैं। यह है इस महोत्सव की विशेषता। कईयों का यहां तक कहना है कि इस संगीत सागर में जो एक बार गोता लगा लेता है, वह अमृत रसपान कर पवित्र हो जाता है। और बाट जोहने लगता है अगले वर्ष का।

पांचवीं निशा का श्री गणेश हुआ कथक नृत्य से, कलाकार थे दिल्ली से पधारे पं. हंरीश गंगानी। इन्होंने नृत्य की शुरुआत शिवस्तुति से कर परंपरागत कथक शैली को अपनाते हुए कई आकर्षणीय चीजों को प्रस्तुत किया। आपने भजन भरत भाई कवि से उरीन हम नाही में भाव अंग को दिखाते हुए तत्कार में कई टुकडों का प्रदर्शन कर नृत्य को विराम दिया। आपके साथ तबले पर शुभ महाराज, गायन में विनोद गंगानी, पखावज पर आशीष गंगानी व सारंगी पर गौरी बनर्जी ने कुशल भागीदारी की।

दूसरी प्रस्तुति में पूणे से पधारे विख्यात गायक पं. उल्लाहस कशालकर ने अपनी गायकी का रंग बिखेरा। इनकी गायकी से यहां के श्रोता पूर्व परिचित हैं, अत: इनको सुनने के लिए भीड उमड पडी थी। इन्होंने सर्वप्रथम राग तिलक कामोद में एक बंदिश से गायन को विराम दिया। इनके साथ तबले पर तालयोगी पं. सुरेश तलवरकर व साथ गायन में पं. ओजश प्रताप सिंह ने संगत के मध्यम से पूरा सहयोग दिया।

तीसरी प्रस्तुति में प्रख्यात बांसुरी वादक पं. राकेश चौरसिया ने बांसुरी वादन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इन्होंने वादन की शुरुआत राग जोग में किया जिसके अन्तर्गत रूपक में विलम्बित, अद्वाताल में मध्यलय, व तीन ताल में द्रुतकारी से राग जोग को विराम दिया। तत्पश्चात पहाडी में एक धुन से प्रस्तुति को विराम दिया। इनके वादन में एक अलग आकर्षण रहा। आपके साथ तबले पर सहभागिता किया लंदन से पधारे पं. संजू सहाय ने। एक आकर्षणीय प्रस्तुति रही।

चौथी प्रस्तुति में हुबली से पधारे पं. जयतीर्थ मेवुन्डी का गायन। आपने राग मालकौंस में ख्याल अंग की गायकी प्रस्तुत किया। झुमरा निबद्ध विलम्बित बंदिश के पश्चात तीन ताल में द्रुत बंदिश गाकर मालकौंस को विराम लगाया। इन्होंने गायन को विराम दिया दो भजन से। आपके गायन में किराना घराने की तमाम व चीज सुनने को मिली जिसके लिए यह घराना शीर्षस्थ है। इनके साथ तबले पर पं. केशव जोशी व संवादिनी पर पं. धर्मनाथ मिश्र ने गायन के अनुकूल सहभागिता की।

पांचवी प्रस्तुति में हैदराबाद से पधारे विख्यात मृदंगम वादक डा. येल्ला वेंकटेश्वर राव ने मृदंगम वादन कर श्रोताओं में आनंद का संचार कर दिया। आप तो इस दरबार के जाना पहचाना चेहरा के साथ ही वादन के क्षेत्र में पसंदीदा कलाकार हैं, अत: इनको सुनने के लिए भीड उमड पडी। इन्होंने कई छंदो को बाजकर अपने वादन को विराम दिया।

पांचवीं निशा की छठवीं प्रस्तुति में पिता पुत्र की जोडी ने मंदिर प्रांगण में स्वरों की बारिश कर दिया। मुंबई से पधारे पं. नयन घोष ने सितार व पुत्र नयन घोष ने तबले पर शानदार प्रस्तुति दी। सर्वप्रथम राग भटियार में आलापचारी के पश्चात तीनताल में गतकारी कर प्रथम अध्याय को विराम देकर, राम रामकेली में गतकारी से वादन को विराम दिया। श्रोताओं के फरमाइश पर इन्होंने चैती बजाइ इनके तबले पर इशान घोष की संगत बेमिसाल रही।

अंतिम प्रस्तुति में प्रयागराज से पधारे श्री ऋषि-वरुण मिश्र ने युगल गायन प्रस्तुत किया। इन लोगों ने राग बसन्त मुखारी में दो बंदिशें एकताल व तीन ताल में गाने के पश्चात कई भजनों से गायन को विराम दिया। इन लोगों के साथ तबले पर प्रशांत मिश्र ने जोरदार संगत की। संवादिनी पर अनुराग मिश्र व संवादिनी पर विनायक सहाय ने सारंगी पर गायन के अनुकूल कुशल भागीदारी निभायी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *