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संकट मोचन संगीत समारोह की विराम निशा,संगीत महाकुंभ की पूर्णाहुति में गूंज उठा स्वरमंत्रों का जाप

श्री संकटमोचन संगीत समारोह की अंतिम निशा में संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वम्भर नाथ मिश्र से चर्चा करते सुप्रसिद्ध वायलिन वादक एल सुब्रमणियम और मृदंग वादक पद्मश्री येल्ला वेंकटेश्वर राव।

वाराणसी (सन्मार्ग)। संकट मोचन संगीत समारोह-2024 की छठवीं और विराम निशा, हर संगीत रसिक के चेहरे पर एक तृप्ति की झलक साफ-साफ देखने को मिल रही थी, साथ में एक उदासी भी झलक रही थी, कारण था फिर से एक वर्ष का इंतजार, इस संगीत महाकुंभ में गोता लगाने का। सही मायने में यह एक ऐसा संगीत सम्मेलन है जिसमें सिर्फ स्वर-ताल की धारा ही नहीं बल्कि आस्था और भक्ति की धारा भी प्रवाहित होती है। जिस कारण यह विश्व के शीर्षस्थ आयोजनों में शामिल है। यह हनुमान जी का आशीर्वाद ही है।

कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ पं. जसराज के सुयोग्य शिष्य पं. नीरज पारिख के गायन से। आपने अपनी पत्नी उमा पारिख के साथ राग बिहाग की अवतारणा की। एकताल निबद्ध बडा ख्याल के बाद तीन ताल निबद्ध छोटा ख्याल से बिहाग को विराम दिया। आपने गायन को पूर्ण विराम किया एक भजन से। इनके गायन में पंडित जी की छाप स्पष्ट सुनने को मिली। आपके साथ तबले पर अंशुल प्रताप सिंह, संवादिनी पर मोहित साहनी, व गौरी बनर्जी ने सारंगी पर गायन के अनुकूल सहभागिता किया।

आखिरी निशा की दूसरी प्रस्तुति में मुबंई से पधारे युवा बांसुरी वादक जिसका बहुत से श्रोता बेसब्री से इंतजार कर रहे थे श्री एस. आकाश का बांसुरी वादन रहा। आपने राग आभोगी कान्हडा में आलापचारी के पश्चात झपताल में विलम्बित बंदिश एकताल में द्रुत बंदिश से वादन के बाद तीनताल में जिस लय पर झाला बजाया वह अद्धभुत रहा। इनके साथ तबले पर इशान घोष ने लाजवाब संगत कर वादन को प्रभावी बना दिया।

कार्यक्रम की तीसरी प्रस्तुति संकट मोचन संगीत समारोह का एक ऐतिहासिक कार्यक्रम बन गया। वैसे तो प्रतिवर्ष एक न एक इतिहास बनता है, लेकिन यह कार्यक्रम इतिहास के पन्ने में स्वर्णाक्षरों से लिखा जायेगा। मंच पर गुंदेचा बंधु, उमाकांत गुंदेचा, अनन्त रमाकांत गुंदेचा पखावज पर महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र, पं. अखिलेश गुंदेचा। इन लोगों की चौबन्दी, श्रोताओं को नाकाबंदी कर दिया। इन लोगों को हिलने तक का मौका नहीं दिया। एक अविस्मरणीय पल के साक्षी बने संगीत रसिक।

चौथी प्रस्तुति में प्रसिद्ध पाश्र्वगायिका कविता कृष्णमूर्ति ने अपनी सुमधुर आवाज की जलवा बिखेर कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ग्ध कर दिया। आपने गायन की शुरुआत से कर कुछ फिल्मी गानों से अपनी प्रस्तुति को विराम दिया। आपके साथ साथी कलाकारों ने अच्छी सहभागिता निभाकर प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया।

पांचवीं प्रस्तुति में विश्वविख्यात वायलिन वादक पद्मश्री डा. एल सुब्रमण्यम ने वायलिन वादन कर श्रोताओं को आनंदित कर दिया। वैसे तो आप कर्नाटक शैली में वादन करते हैं, बावजूद इनके वादन की ख्याति विश्व में है तो काशीवासी कैसेअछूता रहे। अत: हर कोई ने जी भरकर इनके वादन को जीया। आपने रागत हंसध्वनि की एक रचना से वादन शुरूकर और भी कई रागों की रचना से वादन को विराम दिया। आपके साथ साथी कलाकारों पं. येल्ला वेंकटेश्वर मृदंगम और पं. तन्मय बोस ने तबले पर जोरदार संगत कर पूरे माहौल को भक्तिमयकर दिया।

छठवीं प्रस्तुति में देश की वरिष्ष्ठ महिला गायिका विदुषी कंकनाबनर्जी ने गायन के क्रम में पहले राग अहीर भैरव की अवतारणा की। आपने झुमरा व तीन ताल में बंदिश के पश्चात एक रामधुन से गायन को विराम दिया। आपके गायन में किराना घराने की छाप सुनने को मिली। आपके साथ तबले पर सुभाष कांति दास, संवादिनी पर मोहित साहनी व सारंगी पर गौरी बनर्जी ने कुशल भागीदारी निभायी।

छठवीं निशा की सातवीं प्रस्तुति में विश्वविख्यात सितार वादक पं. पूर्वायन चटर्जी ने सितार के तारों को झंकृत करते हुए राग मियां की तोडी की अवतारणा की। इसके पश्चात राग चारुकेशी में एक गत से वादन को विराम दिया। आपके वादन से मंदिर परिसर झंकृत हो गया। इनके साथ बनारस घराने के विख्यात तबला वादक पं. संजू सहाय ने अपनी ख्याति के अनुरूप सहभागिता की।

अंतिम प्रस्तुति में पं. भीमसेन जोशी के सुयोग्य शिष्य पं. हरिश तिवारी ने राग ललित में ख्याल गायकी के पश्चात भजन से विराम खींचा। इनके गायन से श्रोता तृप्त हो गये। इनके साथ तबले पर पं. विनोद लेले व संवादिनी पर पं. धर्मनाथ मिश्र ने सहभागिता किया। 101वां श्री संकट मोचन संगीत समारोह व्योमेश शुक्ला, साधना श्रीवास्तव, चंद्रिमा राय व जगदीश्वरी के संचालन में संपन्न हुआ।

मंच पर बैठे पुष्कर नाथ मिश्र,सुमेधा मिश्रा और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय कार्यक्रम का आनंद लेते

कार्यक्रम का अवलोकन करती मदर्स फार मदर की अध्यक्षा आभा मिश्रा के साथ संस्था की सदस्यगण।

संकट मोचन संगीत समारोह के दर्शक दीर्घा में कार्यक्रम का आनंद लेते संगीत रसिक।

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