स्वर्ण जयंती वर्ष अंतर्राष्ट्रीय ध्रुपद मेला: द्वितीय निशा
वाराणसी। महाराज विद्या न्यास के तत्वावधान में तुलसीघाट स्थित ध्रुपद तीर्थ पर आयोजित ५०वां अंतराष्ट्रीय ध्रुपद मेला की द्वितीय निशा में देश-विदेश के प्रतिष्ठित व युवा कलाकारों ने ध्रुपद-धमार जैसे कठिन विधा को अपनाकर प्रस्तुति से यह साबित कर दिया कि अब यह विधा कठिन नहीं रहा, बल्कि उपासना व अभ्यास से अपना एक अलग स्थान बना लिया है। जो रुचिकर बन चुका है।
कार्यक्रम की पहली प्रस्तुति में कोलकाता की प्रतिष्ठित गायिका विदुषी काबेरी करने राग काम्बोजी में चौताल निबद्ध ध्रुपद की अवतारणा कर, राग देश में धमार से गायन को विराम दिया। इनका गायन श्रुतिपूर्ण रहा। इनके साथ पं. तापसदास ने पखावज पर कुशल संगत की दूसरी प्रस्तुति में भोपाल से पधारी धानी गुन्देचा ने गायन की शुरुआत की राग श्री से। इन्होंने आलापचारी के पश्चात ताल धमार निबद्द्ध बंदिश से धमार अंग को विराम देकर गायन को विराम दिया।
इसके पश्चात डा. मधुभट्ट तैलंग ने गायन प्रस्तुत किया इन्होंने राग जैजवन्ती में आलापचारी के पश्चात चौताल में ध्रुपद गायन के पश्चात धमार ताल में एक होरी से गायन को विराम दिया। इनका गायन प्रभावपूर्ण रहा। इनके साथ पखावज पर मनमोहक नायक व सारंगी पर गौरी बनर्जी ने गायन के अनुकूल सहभागिता की। चौथी प्रस्तुति में पं. रविन्द्र नारायण गोस्वामी ने सुरबहार वादन कर श्रोताओं को मोह लिया। इन्होंने राग चंपाकली में चौताल व सूलताल में गतकारी कर वादन को विराम दिया। इनके साथ पखावज पर कोलकाता के प्रोबाल नाथ ने पुरी सूझबूझ के साथ सहभागिता की।
अगली प्रस्तुति में लखनऊ के शशिकांत पाठक ने स्वतंत्र पखावद वादन प्रस्तुत किया। इन्होंने चौताल में कई परने, टुकडा बजाकर वादन को विराम दिया। इसके बाद श्रीमती संचिता चौधरी, रुबी मुखर्जी, व सुश्री मुक्तिका मुखर्जी ने समय के अनुकूल रागों के गायन से ध्रुपद अंग को कायम रखते हुए श्रोताओं को रससिक्त कर दिया। वहीं वादन के क्रम में श्री पुष्पराज कोष्ठी ने सुरबहार, डा. संजय वर्मा ने विचित्र वीणा व श्री ऋतुराज भोसले ने पखावज स्वतंत्र वादन कर दूसरी निशा को विराम दिया। संचालन प्रीतेश आचार्य, नागेंद्र शर्मा ने किया।
एक अविस्मरणीय क्षण- मंच पर गाने बैठे गुंदेचा बंधु (पं. उमाकांत गुंदेचा-रमाकांत गुंदेचा)। पखावज पर संगत को बैठे महंत पंडित विशम्भरनाथ मिश्र व पं. अखिलेश गुंदेचा। गुंदेचा बंधुओं ने राग बागेश्री में आलापचारी के पश्चात जब बंदिशों का दौर शुरू किया, गूंज उठा ध्रुपद तीर्थ लगा स्वयं शिव डमरू के साथ मंच पर उपस्थित हैं। रोम-रोम पुलकित हो उठा। जब प्रस्तुति संपन्न हुआ। एक अजीब सन्नाटा देखने को मिला सब निरुत्तर मंच को निहारते रहे। ध्रुपद मेले की स्वर्ण जयंती पर महाराज विद्या मंदिर न्यास द्वारा प्रत्येक कलाकार को स्मृति चिह्न प्रदान किया गया। महंत जी ने कहा कि इस आयोजन में मेरे द्वारा पखावज की प्रस्तुति पूज्य माता जी को श्रद्धांजलि है।

