वाराणसी, सन्मार्ग। कुछ आयोजन ऐसे होते हैं जिसका लोगों को वर्षभर इंतजार रहता है। और जब आयोजन के तिथि की घोषणा हो जाती है तो वही आयोजन लोगों के लिए एक पर्व बन जाता है, और जुट जाते हैं पर्व में शामिल होने की तैयारी में एसा ही एक पर्व है संकट मोचन संगीत समारोह। चैत्र पूर्णिमा को आयोजित हनुमज्जयन्ती के चौथे दिवस से शुरू हुई छह दिवसीय संगीत समारोह संकट मोचन मंदिर के मुक्ताकाशीय मंच पर हर वर्ष राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय कला साधक हनुमान जी के चरणों में अपनी हाजिरी लगाकर अपने आपको धन्य बना लेते हैं। साथ ही संगीत रसिक भी धन्य हो जाते हैं।
ऐसे ख्यातिलब्ध कलाकारों को सुनकर इसबार भी 27 अप्रैल से 2 मई तक आयोजित संगीत समारोह में युवा व प्रतिष्ष्ठित कलासाधकों ने अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं को तृप्त कर दिया। रात्रिव्यापी आयोजन का शुभारंभ बिना किसी आडंबर के हुआ।
101वें छह दिवसीय संकट मोचन संगीत समारोह का शुभारंभ हुआ विश्वविख्यात ओडिसी नृत्यकार पं. रतिकांत महापात्रा व श्रीमती सुजातामहापात्रा के नृत्यांजलि से इन लोगों ने सृजन संस्स्था के शिष्याओं के साथ ओडिसी नृत्य का एसा समा बांधा कि दर्शक अभिभूत होकर मंच को निहारते रह गये। इन लोगों ने सबरी शिव संगम शनम अभिनय जटायू मोक्ष नृत्यनाटिका का नयनाभिराम प्रस्तुति से प्रस्तुति को विराम दिया।
दूसरी प्रस्तुति में कु. अवंतिका महाराज ने एकल तबलावादन प्रस्तुत किया। इन्होंने तीनताल में कई बनारस घराने की चीजें बजाकर वादन को विराम दिया। इनके साथ सारंगी पर विनायक सहाय ने लहरा देकर इनके वादन को खूबसूरत बनाया।अगली प्रस्तुति में मुंबई से पधारी श्रीमती नंदिनी नरेंद्र बेडेकर का गायन हुआ।
इन्होंने सर्वप्रथम राग केदार में दो बंदिशें क्रमश: तीन ताल व मध्यालय एकताल में गाने के पश्चात राग नायकी कान्हडा में रुपक में एक बंदिश से गायन को विराम दिया। इनके गायन में डा. किशोरी अभोनकर जी के गायन की छाप स्पष्टरूप से सुनने को मिली। इनके साथ पं. विनोद लेले ने तबले पर पं. विनोद मिश्र ने संवादिनी पर तथा गौरी बनर्जी सती ने सारंगी पर साथ दिया। इनके साथ प्रतीक राजन मुगेकर ने गायन किया।
श्रोताओं की मांग पर एक भजन से इन्होंने मंच को प्रणाम किया। चौथी प्रस्तुति में विश्वविख्यात संतूर वादक पं. सतीश ब्यास ने संतूर वादन कर श्रोताओंको मंत्रमुग्ध कर दिया इन्होंने सर्वप्रथम राग कौशिक कान्हडा में दो गते बजायी। आलापचारी के पश्चात रुपक व तीनताल में गतकारी कर प्रथम अध्याय को विराम दिया। आपके साथ तबले पर पं. ओजश अधिया ने लाजवाब संगत कर प्रस्तुति को प्रभावी बना दिया। प्रस्तुति में श्रोतागण स्वर व ताल के अठखेलियों में झूमते नजर आये।
पांचवी प्रस्तुति में कोलकाता से पाधारी सुश्री मिनाक्षी मजुमदार ने गायन प्रस्तुत करते हुए सर्वप्रथम राग आभोगी में झपताल व द्रुतएकताल में दो बंदिशे गाने के पश्चात चैती व टप्पा से गायन को विराम दिया। आपका गायन प्रभावशाली रहा। गायन में स्वरों की शुद्द्धता अच्च्छी रही। इनके साथ तबले पर श्री देवज्योति बोस ने, संवादिनी पर पं. धर्मनाथ मिश्र ने तथा गौरी बनर्जी सती ने सारंगी पर गायन के अनुकूल सहभागिता निभायी। इसके पश्चात प्रयागराज से पधारे श्री विजयचंद्रा ने की बोर्ड पर चारुकेशी को अवतारणा की आपने पहलेभत्तताल में विलम्बित गत बजाने के पशचात रुपक व तीन ताल में गतकारी कर वादन के प्रथम अध्याय का समापन किया। तत्पश्चात एक धुन से वादन को विराम दिया।
आपके साथ तबले पर श्री अनूप बनर्जी ने अच्छी भागीदारी निभायी। अंतिम प्रस्तुति में पं. साजन मिश्र व श्री स्वरांश मिश्र ने युगल गायन प्रस्तुत किया। इन लोगों ने राग बैरागी में सर्वप्रथम विलम्बित एक ताल व मध्यलय एकताल में बंदिश प्रस्तुत कर प्रथम अध्याय का समापन कर कई भजनों से गायन को विराम दिया। इन लोगों के गायन से मंदिर प्रांगण में भक्तिरस प्रवाहित हो गया। इन लोगों के साथ पं. शुभ महाराज ने तबले पर, पं. धर्मनाथ मिश्र ने संवादिनी पर तथा श्री विनायक सहाय ने सारंगी पर साथ दिया। इसके साथ सम्पन्न हुआ प्रथम निशा का महापर्व।
