वाराणसी, सन्मार्ग। श्री संकट मोचन हनुमान जी की जयंती के पावन अवसर पर आयोजित तीन दिवसीय सार्वभौम रामायण सम्मेलन के प्रथम दिन बुधवार को सायंकाल मंगलाचरण से प्रारंभऊ हुआ। इस अवसर पर काशी के मूर्धन्य विद्वान डा. परमेश्वर दत्त शुक्ल ने कहा कि रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने पांच चरित्रों का वर्णन किया है।
प्रथम उमा चरित्र दूसरा महादेव का चरित्र, तीसरा पवन पुत्र हनुमान जी महाराज का, चौथा भरत जी का चरित्र, पांचवां कागभुसुण्डी का मिलता है। सभी के चरित्र से मनुष्य को जीवन में प्रेरणा लेना चाहिए। हनुमान जी का चरित्र सभी को सत्कर्मो में अग्रणी, सभी प्रकार के कष्टों को दूर करने में भी अग्रणी रहते थे, उनमें जरा भी अभिमान नहीं था। हनुमान जी पर सदैव प्रभु श्रीराम की कृपाबनी रहती थी। इससे हरेक कार्य सफलतापूर्वक हो जाते थे। दूसरे वक्ता डा. चंद्रकार द्विवेदी ने कहा कि यदि सती नहीं होती तो शिवचरित्र नहीं होता। बिना विवेक के कथा नहीं हो सकती है। हनुमान जी के समान कोई बडभागी नहीं है। वे पर्वत पर बैठकर प्रभु श्रीराम की कथाओं का श्रवण करते हैं, वहां जामवंत जी भी उपस्थित रहते हैं। अपने भक्त की भक्ति को देखकर प्रभु स्वयं वहां उपस्स्थित हो जाते हैं। वे बडभागी के साथ अनुरागी भी थे।
कथा श्रवण का उद्देश्य जीवन में उतारना ही श्रेयस्कर होता है। पं. नंदलाल उपाध्याय ने सर्वप्रथम इस स्थान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यहां संकट मोचन हनुमान जी हर समय भक्तों के दुखों को दूर करने के लिए तत्पर रहते हैं। संत तुलसीदास जी ने हनुमान जी को चार पिता का पुत्र बताया है। प्रथम शंकर सुवन दूसरा केशरी नंदन, तीसरा पवनपुत्र और सीताराम जी के पुत्र। इसका तात्पर्य यह है कि हनुमान जी महाराज शिव के ज्ञानी पुत्र, केशरी के कर्मपुत्र, पवन के औरस पुत्र सीताराम जी के शरणागत पुत्र थे। हनुमान जी का अवतार राम जी के कार्य हेतु हुआ है।
अन्य विद्वानों में प्रो. नविनी श्याम शुक्ल ने कहा कि हनुमान जी मंगल के खान है। भक्ति और तपस्या के बल पर हरेक कार्य कर देते थे। राम की कथा तभी समझ में आयेगी जब हमें श्रद्धा होगी। रामचरित मानस हमें जीवन जीने की कला सीखाती है। सभी को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। अन्य वक्ताओं में पं. जितेंद्रमणि त्रिपाठी, पं. प्रमोद कुमार मिश्र ने भी हनुमान जी के जीवन चरित्र पर प्रकाश डाला। रात्रि 10 बजे कथा का समापन हुआ। कथा का संचालन पं. राघवेंद्र पांडेय व नंदलाल उपाध्याय ने किया। आरती के पश्चात सभी भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया। अंत में महंत प्रो. विश्वम्म्भरनाथ मिश्र ने सभी को आशीर्वाद दिया।
