वाराणसी। गंगा में बाढ़ के चलते मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के शवदाह गृह अब नहीं डूबेंगे। दोनों मोक्ष तीर्थों को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। हाई फ्लड लेबल को ध्यान में रखकर काम कराया जा रहा है। चुनार और जयपुर के पत्थर लगाए जा रहे हैं।


काशी में 1978 में आई अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ को मानक मानकर काम कराया जा रहा है। 1978 में गंगा का जलस्तर 73.90 मीटर तक पहुंच गया था। इसे ही बाढ़ का उच्चतम बिंदु माना गया है। 2013 और 2016 की गंगा बाढ़ में जब जलस्तर 72 मीटर से ऊपर गया तो शवदाह गृहों पर शवदाह की क्रिया बाधित हुई थी। इसे ध्यान में रखते हुए शवदाह स्थलों का कायाकल्प कराया जा रहा है। मणिकर्णिका घाट की ऊंचाई 73.90 मीटर की जा रही है। दुनिया का एक मात्र ऐसा श्मशान घाट है, जहां 24 घंटे चिताएं जलती रहेंगी।


मणिकर्णिका घाट के आसपास के हेरिटेज स्थलों को भी नया लुक दिया जाएगा। इसमें चक्र पुष्करिणी, रत्नेश्वर महादेव मंदिर, तारकेश्वर मंदिर और दत्तात्रेय पादुका का भी जीर्णोद्धार कराया जा रहा है। घाट पर सीढिय़ों और सड़क का निर्माण कराया जा रहा है। भूतल पर पंजीकरण कक्ष, नीचे के खुले में दाह संस्कार के 19 वर्थ, लकड़ी भंडारण क्षेत्र, सामुदायिक प्रतीक्षा कक्ष, दो सामुदायिक शौचालय, अपशिष्ट ट्रालियों के स्थापन और मुंडन क्षेत्र होंगे।
सीएसआऱ फंड से कायाकल्प – मंडलायुक्त कौशलराज शर्मा के मुताबिक घाटों का कायाक्लप सीएसआर फंड से कराया जा रहा है। घाटों पर सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं, ताकि शव लेकर आने वालों को किसी तरह की दिक्कत न होने पाए। वहीं बाढ़ आने पर दाह संस्कार की क्रिया प्रभावित न होने पाए।

18 करोड़ से मणिकर्णिक और 16 करोड़ से हरिश्चंद्र का कायाकल्प
मणिकर्णिका घाट के विकास कार्य पर 18 करोड़ रुपये खर्च होंगे। भूतल का कुल क्षेत्रफळ 29.30 वर्ग फीट है। दाह संस्कार का क्षेत्रफल 12.250 वर्गफीट तय किया गया है। प्रथम तल 20.200 वर्गफीट का होगा। इसमें दाह संस्कार के लिए क्षेत्रफल 9100 वर्गफीट का होगा। वहीं हरिश्चंद्र के विकास पर 16.86 करोड़ खर्च होंगे। यह क्षेत्र 13.250 वर्गफीट है। दाह संस्कार का क्षेत्रफल 6200 वर्ग फीट है।

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